Posts

चन्द्र ग्रहण का अनोखा रहस्य

Image
चन्द्र ग्रहण का अनोखा रहस्य  ग्रहण एक ऐसी खगोलीय घटना है जो #पृथ्वी, #सूर्य_और_चंद्रमा के बीच की ज्यामितीय स्थिति से उत्पन्न होती है। सूर्य सिद्धांत में इसे गहन गणितीय सूत्रों से समझाया गया है, जहाँ ग्रहण की गणना सूर्य, चंद्रमा और #राहु_केतु (चंद्र पात या नोड्स) के सापेक्ष स्थिति पर आधारित है।  यह ग्रंथ (लगभग 400 – 500 ईस्वी के आसपास संकलित) खगोलीय गणित का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें सूर्य और #चंद्रमा_के_व्यास, पृथ्वी की छाया की चौड़ाई, और नोड्स की गति का वर्णन है। चंद्र ग्रहण तब होता है जब #पूर्णिमा के समय चंद्रमा पृथ्वी की छाया (#उम्रा_और_पेनुम्ब्रा) में प्रवेश करता है। भौतिक रूप से यह पृथ्वी के बीच आने से सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक न पहुँच पाती है, जिससे चंद्रमा अंधकारमय या लालिमा युक्त (#ब्लड_मून) दिखाई देता है—यह लालिमा पृथ्वी के वायुमंडल से सूर्य की रोशनी के अपवर्तन (#रिफ्रैक्शन) के कारण आती है।  सूर्य सिद्धांत में इसे छाया की ज्यामिति से गणना किया गया है, जहाँ #चंद्रमा के व्यास और पृथ्वी की छाया की लंबाई को कोणीय माप से जोड़ा जाता है। खगोलीय गणित में य...

१०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है।

Image
✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है। ✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं...

देवियों के नाम और परिचय.....

देवियों के नाम और परिचय..... 1.माता सरस्वती (विद्या की देवी ब्रह्मा की पत्नी)। 2.माता सरस्वती (ब्रह्मा-सावित्री की पुत्री)। 3.सावित्री (ब्रह्मा की पत्नी)। 4.गायत्री (ब्रह्मा की पत्नी)। 5.श्रद्धा (ब्रह्मा की पत्नी)। 6.मेधा (ब्रह्मा की पत्नी)। 7. शतरूपा (स्वायंभुव मनु की पत्नी)। 8.अदिति (कश्यप की पत्नी और देवताओं की माता)। 9.श्रद्धा (अंगिरा की पत्नी और बृहस्पति मां)। 10.उषा (द्यौ की पुत्री)। 11.माता लक्ष्मी (भगवान विष्णु की पत्नी)। 12. देवी तुलसी (वृंदा देवी विष्णु का अंश)। 13.विंध्यवासिनी देवी योगमाया (यशोदा की पुत्री एकानंशा, श्रीकृष्ण की बहन)। 14.यमुना देवी (यमराज की बहन कालिंदी)। 15. शचि (इंद्र की पत्नी इंद्राणील ज्वालादेवी की उपासक)। 16. देवी आर्याणि- (पितरों के अधिपति अर्यमा की बहन, अदिति की पुत्री, सूर्यपुत्र रेवंतस की पत्नी हैं)। 17.अम्बिका : (त्रिदेव जननी जगदम्बे, दुर्गा, कैटभा, महामाया और चामुंडा)। 18.सती : (दक्ष प्रजापति की पुत्री, भगवान शंकर की पत्नी)। 19.पार्वती : (राज हिमवान और रानी मैनावती की पुत्री, भगवान शंकर की पत्नी, पु?त्र कार्तिकेय, गणेश और पुत्री अशोक सुंदरी की माता...

नक्षत्र

Image
नक्षत्र चन्द्रमा पृथ्वी का  (27 -28 ) 27.3  दिन में काटता है और इस दौरान आकाश में अपना एक पथ बना बना लेता है.  चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र को पार करता हुआ प्रतिमास  27  प्रमुख सत्ताईस नक्षत्रों की यात्रा पूरी कर लेता है।  खगोल में यह भ्रमणपथ इन्हीं तारों के बीच से होकर गया हुआ जान पड़ता है । इसी पथ में पड़नेवाले तारों के अलग अलग दल बाँधकर एक एक तारकपुंज का नाम नक्षत्र रखा गया है ।  इस रीति से सारा पथ इन 27 नक्षत्रों में विभक्त होकर  ' नक्षत्र चक्र '  कहलाता है ।   पुराने समय में इस पथ को  27.3  बराबर भागों में तारों के नाम पर बांट दिया गया था. इस  27.3  तारों के समूह को हम नक्षत्र मंडल के नाम से जानते हैं व इनमें हर तारे को नक्षत्र संज्ञा दी गई है.    नक्षत्रमंडल का एक और विभाजन भी है जो  12  भागों में किया गया है. इन्हें हम राशियां कहते हैं. यह हर राशी  2.25  नक्षत्रों के बराबर होती है. आकाश में तारा-समूह को नक्षत्र कहते हैं। साधारणतः यह चन्द्रमा के पथ से जुडे हैं ,  पर वा...

श्रीजयादुर्गा स्तोत्र

#श्रीजयादुर्गा स्तोत्र =हिन्दी अर्थ सहित}   (ब्रह्मवैवर्तपुराण,श्रीकृष्णजन्मखण्ड,अध्याय 27)  में भगवान श्रीनारायण कहते हैं- मुने ! अब तुम देवी का वह स्तवराज सुनो, जिससे सब गोपकिशोरियाँ भक्तिपूर्वक पार्वती जी का स्वतन करती थीं, जो सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाली हैं। जब सारा जगत घोर एकार्णव में डूब गया था, चन्द्रमा और सूर्य की भी सत्ता नहीं रह गयी थी, कज्जल के समान जलराशि ने समस्त चराचर विश्व को आत्मसात कर लिया था,  उस पुरातन काल में जलशायी श्रीहरि ने ब्रह्माजी को इस स्तोत्र का उपदेश दिया। उपदेश देकर उन जगदीश्वर ने योगनिद्रा का आश्रय लिया। तदनन्तर उनके नाभिकमल में विराजमान ब्रह्मा जी जब मधु और कैटभ से पीड़ित हुए, तब उन्होंने इसी स्तोत्र से मूलप्रकृति ईश्वरी का स्तवन किया।  हरि ॐ तत्सत् श्रीगणेशाय नमः। 'ॐ नमो  भगवती जयदुर्गायै' 🍁विनियोगः -ॐ अस्य श्रीजयदुर्गा महामन्त्रस्य, मार्कण्डयो मुनिः, बृहतीछन्दः, श्रीजयदुर्गा देवता, प्रणवो बीजं, स्वाहा शक्तिः । श्रीदुर्गा प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । 🍁हृदयादिन्यासः - ॐ दुर्गे हृदयाय नमः । ॐ दुर्गे शिरसि स्वाहा । ...