Posts

मोवाइल नेवोलॉजी १

the last 4 digits. हम 10 नंबर होते हैं सर मोवाइल नेवोलॉजी में। ठीक है। अथ लास्ट के चार डिजिट की वैल्यू ज्यादा दी जाती है। मैंने ये सुना है। लो ऐसा क्यों है? शुरुआत के नंबर क्या कुछ भी नहीं है सर। चलो में आपको उसका देखो में है ना मेरा बेसिक एजुकेमान भले ही में सीए को पढ़ाता हूं लेकिन मेरा पहले जी 11 12th है वो साइंस का हुआ है। हां जी। तो मैंने एक लाइफ में एक चीज फॉलो की। भले ही में ऑवरट को मानता हूं लेकिन हर चीज को गॉजिक है जो बात करो नहीं तो मत करो। हम वर्ल्ड के जितने भी कंट्रीज है उस कंट्री में सगभग 60 टका कंट्री ऐसे है कि जहां पे शुरुआत के छह नंबर आप आपके चॉइस के ले ही नहीं सकते। अच्छा तो इसका मतलब ये हो गया कि वो कंट्री में सारे लोग अभी एक एग्जांचल देता है। शजिल नाम देश है। उनकर कंट्री कोड 248 है। अभी आप गोबाइल नंबर 248 आते ही तो प्रत्तय आ जाएगा। तो वो देश तो बहुत अच्छा कर रहा है। महाराष्ट्र में एक शदार है जानना जहा के सादा डिस्ट्रिक्ट प्लेस है। हर आदमी इनकम टैक्स की रेड पड़े उतना पैसा कमा रहा है। तो बहां का भी कोड 248 है। तो जो चीजें बदल नहीं सकते ना उसका इंपेक्ट नहीं होता है। ...

कालचिन्तन

√●●कालचिन्तन... √★ हम सब का नियन्ता काल है। शेषनाग काल है। शेषशायी पुरुष धर्म है। धर्म का व्यायाम क्षण से युग पर्यन्त है तथा विस्तार मुहूर्त से परार्धपर्यन्त है। तीस मुहूर्त का एक दिनरात (होरा) होता है। तीस होरा का एक मास होता है । १२ मासों का एक संवत्सर होता है। एक संवत्सर में दो अयन हैं-उत्तरायण और दक्षिणायन । मनुष्य के दिनरात का विभाग सूर्यदेव करते हैं। रात प्राणियों के विश्राम के लिए तथा दिन क्रियाशील रह कर कर्म करने के लिए है। मनुष्यों के एक मास में पितरों का एक दिनरात होता है। शुक्लपक्ष पितरों का दिन है तथा कृष्णपक्ष पितरों की रात है। मनुष्य का एक वर्ष देवताओं के एक दिनरात के बराब होता है। उत्तरायण देवताओं का दिन है, दक्षिणायन उन की रात्रि है। देवताओं के चार हजार वर्षों का एक सतयुग होता है। सतयुग में चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या होती है तथा इतने ही वर्षों का एक संध्यांश होता है। इस प्रकार, सतयुग का सम्पूर्ण मान ४००० + ४०० + ४०० = ४८०० दिव्यवर्ष है। संध्या एवं संध्यांशों सहित अन्य तीन युगों का मान भी इसी प्रकार स्पष्ट है। त्रेता का सम्पूर्ण मान ३००० + ३०० + ३०० = ३६०० दिव्यवर्ष, ...

ग्रहण (Solar–Lunar Eclipse) का शास्त्रीय एवं गणितीय विवेचन"

Image
ग्रहण (Solar–Lunar Eclipse) का शास्त्रीय एवं गणितीय विवेचन"  1. प्रस्तावना:  प्राचीन भारत में विज्ञान—विशेषतः खगोलशास्त्र (Astronomy)—का विकास अत्यंत उन्नत और व्यवस्थित रूप में हुआ था। इस समस्त वैज्ञानिक परंपरा की भाषा संस्कृत रही, जिसमें न केवल दार्शनिक विमर्श अपितु अत्यंत जटिल गणितीय एवं खगोलीय सिद्धांतों को भी सुस्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया गया। ग्रहण (Eclipse) की संकल्पना भारतीय खगोलशास्त्र में एक प्रमुख अध्ययन-विषय रही है। सूर्य और चन्द्र ग्रहण की गणना, उनके समय, अवधि, दिशा, तथा दृश्य स्वरूप के सूक्ष्म अवयवों का विश्लेषण अत्यंत परिष्कृत गणितीय पद्धतियों के माध्यम से किया गया। विशेषतः 7वीं शती के महान गणितज्ञ–खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त द्वारा रचित “ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त” (628 ई.) में ग्रहण-गणना के 14 अवयवों (Parameters) का उल्लेख मिलता है— दिश्, वलन, वेला, निमीलन, उन्मीलन, स्थिति, विमर्द, स्पर्श, छाया, मोक्ष, ग्रास, इष्टग्रास, परिलेख यहां इन चौदह अवयवों का शास्त्रीय, गणितीय तथा खगोलीय विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है। 2. ग्रहण का वैज्ञानिक आधार (Scientific Basis of Eclipse):...