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१०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है।

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✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है। ✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं...

नक्षत्र

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★★★★नक्षत्र ★★★    "यं न क्षीयते तं नक्षत्रम्" जो क्षीण नहीं होते हैं उनको नक्षत्र कहते हैं।  "णक्षगतौ"(पाणिनीय धातुपाठभ्वादि ४४२) धातु से "अमिनक्षियजिवधिपतिभ्योऽत्रन्" इस उणादि सूत्र से अत्रन् प्रत्यय करके नक्षत्र शब्द बनता है। "न क्षीयते क्षरते वा इति नक्षत्रम्"अर्थात् जो क्षीण नहीं होते अथवा क्षरित नहीं होते उन्हें नक्षत्र कहते हैं। इस विग्रह में नत्र और क्षत्र पद में समास करके..  "न भ्राण्नपान्नवेदा।" (पाणिनीय अष्टा० ६/३/७५)   सूत्र से नञ् का प्रकृतिभाव हो गया।  "नक्षत्राणि नक्षतेर्गतिकर्मणः।"      (निरुक्त ३/२०)  गति और कर्म से क्षीण न होने के कारण नक्षत्र कहे जाते हैं। इन्हीं तथ्यों को श्रुति भी प्रमाणित करती है ... "तन्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वं यन्न क्षियन्ति ।"    (गोपथ उत्तर ब्राम्हण १/८) नक्षत्रों का वही नक्षत्रत्व है, कि वह क्षीण नहीं होते। "न वै तानि क्षत्राणि अभूवन्निति तद्वै नक्षत्राणां नक्षत्रत्वम्।"(शतपथ ब्रा० २/२/१९)  निश्चय ही वे कभी क्षीण नहीं होते, यही है उन नक्षत्रों का नक्षत्...