नक्षत्र

★★★★नक्षत्र ★★★

   "यं न क्षीयते तं नक्षत्रम्"
जो क्षीण नहीं होते हैं उनको नक्षत्र कहते हैं।

 "णक्षगतौ"(पाणिनीय धातुपाठभ्वादि ४४२) धातु से "अमिनक्षियजिवधिपतिभ्योऽत्रन्" इस उणादि सूत्र से अत्रन् प्रत्यय करके नक्षत्र शब्द बनता है।
"न क्षीयते क्षरते वा इति नक्षत्रम्"अर्थात् जो क्षीण नहीं होते अथवा क्षरित नहीं होते उन्हें नक्षत्र कहते हैं। इस विग्रह में नत्र और क्षत्र पद में समास करके..

 "न भ्राण्नपान्नवेदा।"
(पाणिनीय अष्टा० ६/३/७५)  

सूत्र से नञ् का प्रकृतिभाव हो गया। 

"नक्षत्राणि नक्षतेर्गतिकर्मणः।"
     (निरुक्त ३/२०) 

गति और कर्म से क्षीण न होने के कारण नक्षत्र कहे जाते हैं। इन्हीं तथ्यों को श्रुति भी प्रमाणित करती है ...
"तन्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वं यन्न क्षियन्ति ।"
   (गोपथ उत्तर ब्राम्हण १/८)

नक्षत्रों का वही नक्षत्रत्व है, कि वह क्षीण नहीं होते। "न वै तानि क्षत्राणि अभूवन्निति तद्वै नक्षत्राणां नक्षत्रत्वम्।"(शतपथ ब्रा० २/२/१९)  निश्चय ही वे कभी क्षीण नहीं होते, यही है उन नक्षत्रों का नक्षत्रत्व |

नक्षत्र सूर्य के समान स्वयं प्रकाश रूप हैं, जैसा कि श्रुति कहती है...
 "भाकुरयो ह नामैते भाँ हि नक्षत्राणि कुर्वन्ति ।"(शतपथ ब्रा ९/४/१)  ये भा-प्रकाश करने वाले हैं, इसलिए प्रकाशरूप होने से इनका नाम 'भा' है। "नक्षत्राणि वै रोचना दिवि ।"(यजुर्वेद मां.सं. २३/५)  निश्चय ही नक्षत्र ही द्युलोक में— अर्थात् आकाश में प्रकाशक हैं।  जबकि ग्रह पृथ्वी के समान प्रकाशहीन पिण्ड हैं, ग्रहों के ऊपर जो सूर्य की किरणें पड़ती हैं, वे किरणें ही उन्हें प्रकाशित करती हैं। उन ग्रहों पर पड़ने वाली किरणें ही उनसे प्रत्यावर्तित होकर हमें उन ग्रहों को प्रदर्शित करती हैं। जैसा कि श्रुति स्पष्ट करती है— "सूर्यस्यैव हि चन्द्रमसो रश्मयः ।"(शतपथ ब्रा. ९/४/१/९)  निश्चय ही चन्द्रमा की रश्मियाँ सूर्य की ही हैं। अर्थात् वे सूर्य से निकलकर चन्द्रमा पर पड़ती हैं और चन्द्रमा से प्रत्यावर्तित होकर हमें चन्द्रमा की रश्मियों के रूप में दिखाई पड़ती हैं।

नक्षत्र सूर्य के समान ज्वलनशील पिण्ड हैं। जैसा कि श्रुति कहती है...
 "नक्षत्राणां वा एतद्रूपं यल्लाजाः।"
(शतपथ ब्रा. १३/२/१/५) 

निश्चय ही जलता हुआ रूप नक्षत्रों का है। जबकि ग्रह ऊष्णता से रहित हैं, उनमें शीतलता सूर्य की दूरी के क्रम से और सूर्य की किरणों के अभाव से होती है। उन ग्रहों में जो कुछ ऊष्णता प्राप्त होती है, वह सब की सब उन्हें सूर्य से प्राप्त होती है। भी ग्रहों का प्रकाश स्थिर और उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। इसके विपरीत स्वयं जल रहे नक्षत्रों का प्रकाश कम्पित होता हुआ दिखता है। "ज्योतिर्वै नक्षत्राणि "(कौषीतकी ब्रा. २७/६) निश्चय ही नक्षत्र ज्योति ही हैं।

आवश्यक नक्षत्र ज्ञान...
   पृथ्वी की दो प्रकार की गति, सूर्य की स्थिति और खगोल में ग्रहों, उपग्रहों की गति के ज्ञान के लिए, सभी नक्षत्रों के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। पृथ्वी के झुकाव के कारण, सूर्य खगोल में क्रान्ति वृत्ताकार पथ में, ८° अंश दूरी के अंतर से, क्रान्ति वृत्त के दोनों ओर वर्ष भर में चलता हुआ दिखाई देता है। इसलिए ग्रहों की स्थिति जानने के लिए, चन्द्रमा और सूर्य की स्थिति जानने के लिए एवं कालचक्र के सम्यक् ज्ञान के लिए इस १६° अंश व्यापिनी मेखला में, दिखाई पड़ने वाले नक्षत्रों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। यह मेखला ही नक्षत्र मंडल, भ चक्र और मध्यकालीन ज्योतिषियों द्वारा राशि चक्र के नाम से कही जाती है। 

वेदों में इस नक्षत्र मंडल अर्थात् भ चक्र को समानकोणात्मक २७ भागों में बाँटा गया है। इन २७ समान विभाग वाली दूरी में स्थित नक्षत्रों के द्वारा प्रतीत होने वाली आकृति के अनुसार ही वेदों में इनका नामकरण किया गया है। इन्ही समान विभाग में तारा युतियों के द्वारा कल्पित २७ आकृतिओं को ही श्रुतिओं में २७ नक्षत्र कहा गया है। २८ नक्षत्रों के नाम भी वेदों में दिये गये हैं। किन्तु परिगणना के समय २७ भागों को ही ग्रहण किया गया है, जैसा कि ब्राह्मण श्रुतियों में वर्णित है ...

"सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि ।" (ताण्डय.म.ब्रा.२३/२३/३) २७ नक्षत्र हैं।  "तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि ।" वही यह २७ नक्षत्र हैं, मध्य आकाश की १६° अंश चौड़ी वृत्ताकार विषुव मेखला में स्थित नक्षत्रों का २७ विभाग पूर्णतया वैदिक व्यवस्था में विद्यमान है। वेदों में ही वर्णित २८ नक्षत्रों का भी परिगणन इस नक्षत्र मेखला के भीतर ही किया जाता है। अट्ठाइसवाँ नक्षत्र अभिजित नक्षत्र है। उसके सहित नक्षत्र निम्नलिखित हैं।...

१. कृत्तिका, 
२. रोहिणी,
 ३. मृगशीर्ष या इन्वका, 
४. आर्द्रा या बाहू, 
५. पुनर्वसु, 
६. तिष्य या पुष्य, 
७. आश्लेषा,
 ८. मघा, 
९. पूर्वा फल्गुनी, 
१०. उत्तरा फल्गुनी,
 ११. हस्त, 
१२. चित्रा, 
१३. स्वाति या निष्ट्या, 
१४. विशाखा, 
१५. अनुराधा, 
१६. ज्येष्ठा, 
१७. मूल या विचृति या मूलवर्हिणी,
 १८. पूर्व- अषाढ़ा, 
१९. उत्तर अषाढ़ा,
 २०. अभिजित, 
२१. श्रोणा या श्रवण, 
२२. श्रविष्ठा या धनिष्ठा, 
२३. शतभिषक्, 
२४. पूर्व प्रोष्ठपदा या पूर्व भाद्रपद,
 २५. उत्तर प्रोष्ठपदा या उत्तर भाद्रपद 
२६. रेवती, 
२७. अश्विनी, 
२८. भरणी ।

वेद में इन २८ नक्षत्रों का वर्णन ....

यजुर्वेद में नक्षत्रों का ज्ञान अथवा भगण विज्ञान...
 
कालचक्र सम्बन्धी विज्ञान का मूल आधार नक्षत्रों का ज्ञान है। ऋग्वेद में विविध स्थलों में नक्षत्रों के नाम उल्लिखित हैं। नक्षत्रों के माध्यम से ही अपने अक्ष पर घूमती हुई और सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथ्वी का गतिविषयक ज्ञान भी होता है, जैसा कि यजुर्वेद में स्पष्ट है "प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शम् "(यजुर्वेद ३०/१०)  इन सभी मंत्रों में 'आलभते' जो इस अध्याय के इस प्रकरण की समाप्ति पर आया है, अर्थ करने में जुड़ेगा अर्थात् मंत्र अर्थ करने के समय इस प्रकार होगा। 'प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शम्-आलभते ।' अब मंत्रार्थ इस प्रकार होगा- कालचक्र के प्रकृष्ट ज्ञान के लिए राष्ट्राध्यक्ष राजा या उसके द्वारा इस कार्य के निमित्त स्थापित की गयी चयन समिति, नक्षत्र विज्ञान वेत्ता नक्षत्र द्रष्टा को, सम्पूर्ण राष्ट्र से प्राप्त कर नियुक्त करें। "दिवे खलतिम्"(यजुर्वेद ३०/२१)  दिन में दैनिक आर्तव ताप को जानने के लिए खलतिम्-खगोल वैज्ञानिक को सम्पूर्ण राष्ट्र से प्राप्त कर राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करे। अर्थात् प्रतिभा परीक्षण के द्वारा राष्ट्राध्यक्ष या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त सभा राष्ट्र व्यवस्था में ऐसे खगोल वैज्ञानिकों को नियुक्त करें। "सूर्याय हर्यक्षम् " (यजुर्वेद ३०/२१) सूर्य के विज्ञान को जानने के लिए राष्ट्राध्यक्ष राजा सूर्य की किरणों के दोष के प्रतिरोधक हरितवर्णात्मक आँखों के रक्षण में समर्थ यंत्र विज्ञान वेत्ताओं को प्रतिभा परीक्षण के द्वारा राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करें। 'नक्षत्रेभ्य किर्मिरम्"(यजुर्वेद ३०/२१)  नक्षत्रों की स्थिति को जानने के लिए किरणों के ज्ञाता अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को प्रतिभा-परीक्षण के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र प्राप्त कर राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करें। अर्थात् प्रतिभा परीक्षण के द्वारा राष्ट्राध्यक्ष या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त सभा नक्षत्र वेधी यंत्रों के द्वारा नक्षत्रों की सम्यक् स्थिति को जानने वाले नक्षत्र वेत्ता खगोल वैज्ञानिकों को राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करें। "चन्द्रमसे किलासम्”(यजुर्वेद ३०/२१)  चन्द्रमा की स्थिति, चन्द्रमा की कलाओं, और चन्द्र सूर्य ग्रहण को जानने के लिए चन्द्र विज्ञान वेत्ताओं को प्रतिभा परीक्षण के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र से चयनित कर राष्ट्र व्यवस्था में राष्ट्राध्यक्ष राजा या तदर्थ सभा नियुक्त करे। अनन्त आकाश में अनन्त नक्षत्र हैं जैसा कि श्रुति कहती है " यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्ता यावन्तो लोमगर्तास्तावन्तः सहस्त्रसंवत्सरस्य मुहूर्ताः । " जितने ये आकाश में नक्षत्र हैं, उतने शरीर में रोयें हैं। अर्थात् जिस प्रकार से शरीर में रोयें अनगिनत हैं, अनन्त हैं, उसी प्रकार आकाश में नक्षत्र अनगिनत हैं, अनन्त हैं। जैसे शरीर के रोवों का परिगणन सम्भव नहीं, वैसे ही अनन्त आकाश के अनगिनत नक्षत्रों का परिगणन सम्भव नहीं। जितने शरीर में रोयें हैं, उतने हजार संवत्सर के मुहूर्त हैं।  जब शरीर के रोवों का परिगणन ही संभव नहीं है तो उतने संवत्सरों की परिगणना कैसे संभव हो सकती है और फिर उन संवत्सरों की मुहूर्तों की परिगणना की कल्पना भी नहीं हो सकती। जिस प्रकार यह परिगणना असम्भव है उसी प्रकार आकाश में स्थित नक्षत्रों के परिगणन की कल्पना भी असम्भव है।

अथर्ववेद में नक्षत्रों का वर्णन...

 नक्षत्राणि अथर्ववेद सूक्त १९/७, ऋषि:-गार्ग्यः, देवता-नक्षत्राणि -

 "चित्राणि साकं दिवि रोचनानि सरीसृपाणि भुवने जवानि ।
 तुर्मिशे सुमतिमिच्छमानो अहानि गीर्भिः सपर्यामि नाकम् ॥ १॥" 

चित्राणि = चित्र-विचित्र अनेक प्रकार के,
साकं दिवि रोचनानि =साथ साथ द्युलोक में प्रकाशित होने वाले,
सरीसृपाणि= आकाश में सरकते हुए से सदा गतिशील दिखने वाले,
भुवने जवानि= भुवन-ब्रह्माण्ड में
√● वेगवान्, अ- हानि= कभी भी नष्ट न हाने वाले,
√● तुर्मिशं सुमतिं इच्छमानः = अनिष्टनाशक उत्तम बुद्धि की इच्छा करता हुआ, मैं नाकम् - स्वर्गचारी अर्थात् आकाश में चलने वाले नक्षत्रों की,
√● गीर्भिः सपर्यामि=अपनी वाणियों से सपर्या करता हूँ अर्थात् स्तुतिपूर्वक शरणापत्र होता हूँ।

"सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शमार्द्रा ।
 पुनर्वसू सूनृता चारु पुष्यो भानुराश्लेषा अयनं मघा मे || २ ||" 

√●अग्ने - हे अग्ने-परमात्मन्!, कृत्तिका रोहिणी च सुहम् मे अस्तु कृत्तिका और रोहिणी मेरे लिए विनम्रता देने वाले हों, 

√●मृगशिरः भद्रं मे अस्तु मृगशिर नक्षत्र मेरे कल्याण के लिए हो, आर्द्रा शं मे अस्तु - आर्द्रा नक्षत्र मेरे लिए शान्ति देने वाला हो, पुनर्वसु सूनृता मे अस्तु पुनर्वसु नक्षत्र मेरे लिए उत्तम सत् वाक्शक्ति देनेवाला हो, पुष्यः चारु मे अस्तु पुष्य नक्षत्र मेरे लिए उत्तम हो, आश्लेषा भानुः मे अस्तु - आश्लेषा नक्षत्र मेरे लिए सूर्य के समान प्रकाशक हो, मघा अयनं मे अस्तु - मघा नक्षत्र मेरे लिए मार्ग देने वाला हो। 

"पुण्यं पूर्वा फल्गुन्यौ चात्र हस्तश्चित्रा शिवा स्वाति सुखो मे अस्तु । 
राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्ट मूलम् ॥ ३ ॥" 

√●पूर्वा फल्गुन्यौ पुण्यं मे अस्तु - पूर्वा फाल्गुनी के दोनों नक्षत्र मेरे लिए पुण्यकारक हों, अत्र हस्तः चित्रा शिवा मे अस्तु यहाँ हस्त और चित्रा मेरे लिए कल्याणकारी हों, स्वाति सुखः मे अस्तु स्वाती नक्षत्र मेरे लिए सुखदायी हो, राधे विशाखे सुहवा मे अस्तु हे राधा और विशाखा तुम दोनों मेरे लिए उत्तम विनम्रता प्रदान करने वाले होवो, अनुराधा ज्येष्ठा मूलं नक्षत्रं अरिष्ट में अस्तु-अनुराधा, ज्येष्ठा और मूल ये नक्षत्र मेरे लिए विनाशक न हों। 

"अन्नं पूर्वा रासतां मे अषाढा ऊर्जं देव्युत्तरा आ वहन्तु । 
अभिजिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम् ॥४॥"

√● पूर्वा अषाढ़ा मे अन्न रासतां - पूर्वा अषाढ़ा नक्षत्र मेरे लिए अन्न देवे, उत्तरा देवी उर्ज आ वहन्तु उत्तरा अषाढ़ा नक्षत्र उत्तम बल देवे, अभिजित् पुण्यं रासतां एव- अभिजित् नक्षत्र मुझे पुण्य ही देवे, श्रवणः श्रविष्ठाः सुपुष्टि कुर्वतां श्रवण और श्रविष्ठा धनिष्ठा मेरे लिए उत्तम पुष्टि देवें।  यहाँ अभिजित् नक्षत्र के प्रति प्रार्थना करते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह अभिजित् नक्षत्र मुझे पुण्य ही देवे पुण्यमेव रासतां। जिस प्रकार से केवल अभिजित् के लिए 'पुण्यं एव' कहा गया है। उस प्रकार किसी अन्य नक्षत्र के प्रति की गयी प्रार्थना में नहीं कहा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मूलतः यह नक्षत्र पुण्यकाल के रूप में ही मंत्र में प्रयुक्तः है। नक्षत्र मंडल के २७ समान विभागों में इसका अलग से परिगणन नहीं किया जाता है। 

"आ मे महच्छतामिषग्वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म ।
 आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयि भरण्य आ वहन्तु ।। ५ ।।"

√● महत् शतभिषक् - बड़ा शतभिषक् नक्षत्र, मे वरीयः आ मेरे लिए श्रेष्ठता लावे, द्वया प्रोष्ठपदा मे सुशर्म आ दोनों प्रोष्ठपदा भाद्रपद नक्षत्र मुझें उत्तम आवास से सम्पन्न करें, रेवती अश्वयुजौ च मे भगं आ - रेवती और अश्युज अश्विनी नक्षत्र मेरे लिए ऐश्वर्य लावें, और भरण्यः मे रयि आ वहन्तु भरणी नक्षत्र मेरे लिए सम्पत्ति ले आवे। 

√★★★नक्षत्राणि अथर्ववेद सूक्त १९/८, ऋषिः - गार्ग्यः, देवता-नक्षत्राणि, ब्रह्मणस्पति।

 "यानि नक्षत्राणि दिव्यन्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु । 
प्रकल्पयंश्चन्द्रमा यान्येति सर्वाणि ममैतानि शिवानि सन्तु । । १ ।।" 

√●यानि नक्षत्राणि - जो नक्षत्र, दिवि अन्तरिक्षे द्युलोक में, अन्तरिक्ष में, अप्सु भूमौ - जलों में, भूमि पर, यानि नगेषु दिक्षु- जो पर्वतों पर तथा दिशाओं में हैं, चन्द्रमा यानि प्रकल्पयन् एति- चन्द्रमा जिनके साथ चलता हुआ दिखता है। सर्वाणि एतानि मम शिवानि सन्तु- ये सभी नक्षत्र मेरे लिए कल्याणकारी हों,

 "अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं च भजन्तु मे । 
योगं प्रपद्ये क्षेमच क्षेम प्र पद्येयोगं च नमोऽहोरात्राभ्यामस्तु ।। २ ।।"

 √★अष्टाविंशानि - अट्ठाईस नक्षत्र, शिवानि शग्मानि कल्याणकारी और सुखदायी हों, में सह योगं भजन्तु च और मेरे साथ योग प्राप्त करें, योगं प्रपद्ये अच्छी तरह योग प्राप्त हो, क्षेमं प्र पद्ये-अच्छी तरह क्षेम प्राप्त हो, क्षेमं च प्रपद्ये योगं च और इस प्रकार भलीभाँति क्षेम और योग प्राप्त हो, अहोरात्राभ्यां नमः अस्तु- दिन और रात्रि के लिए मैं नमन करता हूँ।

 "स्वस्तितं मे सुप्रातः सुसायं सुदिवं सुमृगं सुशकुन मे अस्तु । 
सुवमग्ने स्वस्त्यमर्त्य गत्वा पुनरायाभिनन्दन || ३ ||"

√★ मे सु-अस्तितं- मेरे लिए अस्तकाल सुन्दर शुभ हो, सुप्रभात: सु सुन्दर प्रातः काल हो, सुसायं- सुन्दर सायं काल हो, सुदिवं- दिन सुन्दर हो, सुमृगं- पशु सुखकारक हों, सुशकुनं मे अस्तु मेरे लिए पक्षी सुन्दर शुभ हों, सुहवं स्वस्ति- मेरी विनम्रता कल्याणकारी हो, अमर्त्यं गत्वा- अमरत्व को प्राप्त होकर, पुनः सब तरफ से आनन्दित होते हुए, आ अय-आओ।

 "अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम् । 
सर्वैमें रिक्तकुम्भान्परा तान्सवितः सुव ।। ४ ।।" 

√●सवितः - हे सविता- हे सबके प्रेरक परमात्मन्, अनुहवं- स्पर्धा, परिहवं- संघर्ष, परिवादं निंदा, परिक्षवं घृणा या छींक आदि, सर्वै: मे रिक्त कुंभान् – इन सब से मेरे घड़े खाली रहें, तान् परा सुव- उन सब स्पर्धा, संघर्ष, निन्दा, घृणा आदि सबको मुझसे दूर करें। 

"अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम् ।
 शिवा ते पाप नासिकां पुण्यगश्चाभि महताम् ।। ५ ।।"

 √●अपपापं परिक्षवं पाप और छींक दूर हो, पुण्यं क्षवं मक्षीमहि पुण्यकारक अन्न हम भक्षण करेंगे, पाप- हे पाप!, शिवा पुण्यगः च कल्याण करने और पुण्य मार्ग में बाधक, ते नसिकां अभि मेहतां तेरी नाक को चारों तरफ से मेहित करें, अर्थात् तेरा अपमान करते हुए परित्याग करें।

 "इमा या ब्राह्मणस्पतेविषूचीर्वात ईरते ।
 यघ्रीचीरिन्द्र ताः कृत्वा मह्यं शिवतमास्कृधि ।। ६ ।।" 

√●ब्रह्मणस्पते इन्द्र हे ज्ञानपते परमात्मन्!, इमाः याः विषूची: जो इन नाना दिशाओं में, वातः ईरते वायु चलती है, ताः सध्रीची: कृत्वा उनको योग्य मार्ग से चलने वाला करके, मह्यं शिवतमाः कृषि मेरे लिए अतिशय कल्याणकारी करें। 

"स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमोऽहोरात्राभ्यामस्तु ।। ७ ।।"

√● नः स्वस्ति अस्तु- हमारा कल्याण हो, नः अभयं अस्तु हमें अभय प्राप्त हो, अहोरात्राभ्यां नमः अस्तु- दिन और रात्रि के लिए नमस्कार हो।

√●●कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता में नक्षत्र वर्णन(कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता ४/४/१०)...

इन नक्षत्रों का वर्णन इस प्रकार है...
 
"कृत्तिका नक्षत्रमग्निर्देवताऽग्ने रुचः स्थ प्रजापतेर्धातुः । 
सोमस्यर्चे त्वा रुचे त्वा द्युते त्वा भासे त्वा ज्योतिष त्वा ।। १ ।।"

√● कृत्तिका नक्षत्र का अग्नि देवता । हे अग्ने ! यह नक्षत्र प्रजापति धाता के द्वारा स्थापित अपनी दीप्ति में स्थित रहे। यह तुम सब मनुष्यों / प्राणियों के लिए चन्द्रमा को दिखाने वाला, तुम सबको द्योतित करने वाला, तुम सबको प्रतिभा-सम्पन्न बनाने वाला, तुम सबको सूक्ष्म ज्ञान देने वाला हो।  इस मंत्र की प्रथम पंक्ति में नक्षत्र के देवता को सम्बोधित कर उससे प्रार्थना की गयी है कि "यह नक्षत्र प्रजापति धाता के द्वारा स्थापित अपनी दीप्ति में स्थित रहे।" इतना अंश सभी नक्षत्रों के देवता के सम्बोधन के साथ जुड़ता रहेगा। और साथ ही सम्पूर्ण द्वितीय पंक्ति भी सभी नक्षत्रों के वर्णन में अनुवर्तित होती रहेगी। तदनुसार ही आगे के सभी नक्षत्रों के अर्थ में यह इतना अर्थ अनुवर्तित होगा - "यह आप सब के लिए चन्द्रमा को दिखाने वाला, आपको द्योतित करने वाला, आपको प्रतिभा सम्पन्न बनाने वाला, आपको सूक्ष्म ज्ञान देने वाला हो।"

"रोहिणी नक्षत्रं प्रजापतिर्देवता ||२||"

 "मृगशीर्ष नक्षत्रं सोमो देवता ॥ ३ ॥"

" आर्द्रा नक्षत्रं रुद्रो देवता ।।४।।"

"पुनर्वसू नक्षत्रमदितिर्देवता।।५।।"

 √●२.रोहिणी नक्षत्रं प्रजापतिर्देवता- रोहिणी नक्षत्र का प्रजापति देवता। हे प्रजापते! यह नक्षत्र प्रजापति धाता के द्वारा स्थापित अपनी दीप्ति में स्थित रहे। यह आप सब के लिए चन्द्रमा को दिखाने वाला, आपको द्योतित करने वाला, आपको प्रतिभा सम्पन्न बनाने वाला, आपको सूक्ष्म ज्ञान देने वाला हो 

√●३.मृगशीर्ष नक्षत्रं सोमो देवता- मृगशीर्ष नक्षत्र का सोम देवता । हे सोम ! यह नक्षत्र... 

√●४.आर्द्रा नक्षत्रं रुद्रो देवता- आर्द्रा नक्षत्र का रुद्र देवता । हे रुद्र! यह नक्षत्र...

√●५.पुनर्वसू नक्षत्रमदितिर्देवता- पूनर्वसू नक्षत्र का अदिति देवता । हे अदिते! यह नक्षत्र......... 

"तिष्यो नक्षत्रं बृहस्पतिर्देवता ॥ ६ ॥"
 "आश्लेषा नक्षत्रं सर्पा देवता ॥७॥"
 "मघा नक्षत्रं पितरो देवता ॥८ ॥" 
"फल्गुनी नक्षत्रमर्यमा देवता ॥९॥"
" फल्गुनी नक्षत्रं भर्गो देवता ॥ १० ॥"
 "हस्तो नक्षत्रं सविता देवता ॥ ११ ॥ "

√●६.तिष्यो नक्षत्रं बृहस्पतिर्देवता- तिष्य नक्षत्र का बृहस्पति देवता । हे बृहस्पते ! यह नक्षत्र ..........

 √●७.आश्लेषा नक्षत्रं सर्पा देवता- आश्लेषा नक्षत्र का सर्पगण देवता । हे सर्पगण! यह नक्षत्र........ 
√●८.मघा नक्षत्रं पितरो देवता- मघा नक्षत्र का पितर देवता । हे पितर! यह नक्षत्र...

 √●९.फल्गुनी नक्षत्रं मर्यमा देवता- पूर्व फल्गुनी नक्षत्र का अर्यमा देवता । हे अर्यमन ! यह नक्षत्र .....

√●१०. फल्गुनी नक्षत्रं भर्गो देवता- उत्तर फल्गुनी नक्षत्र का भग देवता हे भग! यह नक्षत्र ...... 

√●११. हस्तो नक्षत्रं सविता देवता- हस्त नक्षत्र का सविता देवता। हे सविता! यह नक्षत्र.. 

"चित्रा नक्षत्रमिन्द्रो देवता ॥१२॥" 
"स्वाती नक्षत्रं वायुर्देवता ।।१३।।"
 "विशाखे नक्षत्रमिद्राग्नी देवता ।।१४।।" "अनुराधा नक्षत्रं मित्रो देवता ।।१५।।" 

√●१२. चित्रा नक्षत्रमिन्द्रो देवता- चित्रा नक्षत्र का इन्द्र देवता । हे इन्द्र! यह नक्षत्र... 

√●१३. स्वाती नक्षत्रं वायुर्देवता- स्वाति नक्षत्र का वायु देवता । हे वायो! यह नक्षत्र... 

√●१४. विशाखे नक्षत्रमिद्राग्नी देवता- दोनों विशाखा नक्षत्र का क्रमशः इन्द्राग्नी देवता । हे इन्द्राग्नि ! यह नक्षत्र ......
 √●१५. अनुराधा नक्षत्रं मित्रो देवता- अनुराधा नक्षत्र का मित्र देवता । हे मित्र ! यह नक्षत्र.......

 "रोहिणी नक्षत्रमिन्द्रोदेवता ।।१६।।"
" विचृतौ नक्षत्रं पितरो देवता ।।१७।।"
" अषाढ़ा नक्षत्रमापो देवता ।।१८।।"
" अषाढ़ा नक्षत्रं विश्वेदेवा देवता ।। १९ ।।" 

√●१६ .रोहिणी नक्षत्रमिन्द्रोदेवता- रोहिणी ज्येष्ठा नक्षत्र का इन्द्र देवता। हे इन्द्र ! यह नक्षत्र .... 

√●१७. विचृतौ नक्षत्रं पितरो देवता- विचृति नक्षत्र का पितृ देवता । हे पितर! यह नक्षत्र........ 

√●१८. अषाढ़ा नक्षत्रमापो देवता- अषाढ़ा नक्षत्र का जल का अधिष्ठाता आप वरुण देवता। हे आप! - हे वरुण! यह नक्षत्र ............ विश्वेदेवा 

√●१९ .अषाढ़ा नक्षत्रं विश्वेदेवा देवता- उत्तर अषाढ़ा नक्षत्र का देवता। हे विश्वदेव! यह नक्षत्र .........

"श्रोणानक्षत्रं विष्णुर्देवता ॥२०॥"
 "श्रविष्ठा नक्षत्रं वसवो देवता ।।२१।।" "शतभिषङ्नक्षत्रमिन्द्रो देवता ॥ २२॥" "प्रोष्ठपदा नक्षत्रमज एकपाद्देवता ।।२३।।" 

√●२०. श्रोणानक्षत्रं विष्णुर्देवता- श्रोणा श्रवण नक्षत्र का विष्णु देवता । हे विष्णो! यह नक्षत्र.... 

√●२१. श्रविष्ठा नक्षत्रं वसवो देवता- श्रविष्ठा नक्षत्र का वसुगण देवता । हे वसुगण ! यह नक्षत्र ... 

√●२२. शतभिषङ्नक्षत्रमिन्द्रो देवता- शतभिषा नक्षत्र का इन्द्र देवता । हे इन्द्र ! यह नक्षत्र.... 

√●२३. प्रोष्ठपदा नक्षत्रमज एकपाद्देवता- प्रोष्ठ पदा नक्षत्र का अज एकपाद देवता। हे अज, एक पाद ! यह नक्षत्र ....

"प्रोष्ठपदा नक्षत्रमहिर्वृध्नियो देवता ॥२४॥" 
"रेवती नक्षत्रं पूषा देवता ॥२५॥"
 "अश्वयुजौ नक्षत्रमश्विनौ देवता ॥ २६ ॥" "अपभरणी नक्षत्रं यमो देवता ।। २७ ।।" 

√●२४. प्रोष्ठपदा नक्षत्रमहिर्वृध्नियो देवता- प्रोष्ठपदा नक्षत्र का अहिर्बुध्नय देवता। हे अहिर्बुध्निय! यह नक्षत्र..

√●२५. रेवती नक्षत्रं पूषा देवता- रेवती नक्षत्र का पूषा देवता । हे पूषन् ! यह नक्षत्र...

 √● २६. अश्वयुजौ नक्षत्रमश्विनौ देवता- अश्विनी नक्षत्र का अश्विनौ देवता। हे अश्विनौ! यह नक्षत्र.... 

√●२७ .अपभरणी नक्षत्रं यमो देवता- अपभरणी नक्षत्र का यम देवता । हे यम! यह नक्षत्र... 

"पूर्णापश्चाद्यन्ते देवा अदधुः ।"
 (  तैतिरीयसंहिता ४/४/१०/)

√●इस प्रकार आदि से अन्त तक देवताओं ने इन्हें धारण किया है।  चूँकि सम्पूर्ण नक्षत्र मंडल वृत्ताकार है, कोई भी वृत्त ३६०° अंश का ही होता है। इस ३६०° अंश के २७ समान विभागों को २७ नक्षत्र कहा गया है। इन्हीं २७ नक्षत्रों में उन्नीसवें उत्तर अषाढ़ा नक्षत्र की चार घटी और श्रोणा या श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी कुल २९ घटी का अभिजित् नक्षत्र होता है। लेकिन जब नक्षत्र मंडल के समान २७ विभाग करते हैं, तो इसे अलग से नहीं गिनते, यह उन्हीं में अन्तर्निहित होता है। इसी तथ्य को श्रुति स्पष्ट करती है...

"सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि।"
(जैमिनीय ब्रा ३/८६) 

√● २७ दिव्य नक्षत्र हैं।  यहाँ २७ दिव्य नक्षत्र कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि काल परिगणना के लिए नक्षत्र मंडल के २७ विभाग ही किये गये हैं। इसलिए वह दिव्य है। "संवत्सरस्य नक्षत्राणि प्रतिष्ठा।"
(तैतरिय ब्रा ३/११/१/१३)  

√●नक्षत्र संवत्सर की प्रतिष्ठा हैं। 

"तानि वाऽ एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः ।
 सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते ।"
  (शतपथ ब्रा. २०/५/४/५)

√● वे यह निश्चय ही २७ नक्षत्र हैं। उन मुख्य नक्षत्रों के पीछे २७-२७ उपनक्षत्र एक-एक नक्षत्र के पश्चात् स्थित हैं। एक-एक नक्षत्र के पीछे क्रमशः उसके बाद वाले नक्षत्र, नक्षत्र मंडल में स्थित हैं।  यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि मूलतः विभागात्मक नक्षत्र २७ ही हैं। उस एक-एक नक्षत्र विभाग में अनेक छोटे-छोटे नक्षत्र क्रमशः स्थित हैं। जिन्हें श्रुति ने यहाँ उपनक्षत्रों के नाम से कहा है । इन्हीं छोटे-छोटे नक्षत्रों के आधार पर बनने वाली काल्पनिक आकृतियों के दृष्टिगत इन नक्षत्रों का नामकरण किया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि नक्षत्र मंडल को २७ समान विभागों में बाँटकर आकृति-कल्पित नामों से उनका नामकरण किया जाना वेदों की ही देन है। उन्हीं में उत्तर अषाढ़ा और श्रवण नक्षत्र के बीच में अभिजित् की उपस्थिति भी वेदों में ही स्पष्ट है। गणना के लिए उनके २७ विभागों को ही अधिक महत्व दिया गया है।
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