नक्षत्र
नक्षत्र
चन्द्रमा पृथ्वी का (27-28) 27.3 दिन में काटता है और इस दौरान आकाश में अपना एक पथ बना बना लेता है. चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र को पार करता हुआ प्रतिमास 27 प्रमुख सत्ताईस नक्षत्रों की यात्रा पूरी कर लेता है। खगोल में यह भ्रमणपथ इन्हीं तारों के बीच से होकर गया हुआ जान पड़ता है । इसी पथ में पड़नेवाले तारों के अलग अलग दल बाँधकर एक एक तारकपुंज का नाम नक्षत्र रखा गया है ।
इस रीति से सारा पथ इन 27 नक्षत्रों में विभक्त होकर 'नक्षत्र चक्र' कहलाता है । पुराने समय में इस पथ को 27.3 बराबर भागों में तारों के नाम पर बांट दिया गया था. इस 27.3 तारों के समूह को हम नक्षत्र मंडल के नाम से जानते हैं व इनमें हर तारे को नक्षत्र संज्ञा दी गई है. नक्षत्रमंडल का एक और विभाजन भी है जो 12 भागों में किया गया है. इन्हें हम राशियां कहते हैं. यह हर राशी 2.25 नक्षत्रों के बराबर होती है.
आकाश में तारा-समूह को नक्षत्र कहते हैं। साधारणतः यह चन्द्रमा के पथ से जुडे हैं, पर वास्तव में किसी भी तारा-समूह को नक्षत्र कहना उचित है। ऋग्वेद में एक स्थान सूर्य को भी नक्षत्र कहा गया है। अन्य नक्षत्रों में सप्तर्षि और अगस्त्य हैं। आकाश में चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा पर चलता हुआ 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है। इस प्रकार एक मासिक चक्र में आकाश में जिन मुख्य सितारों के समूहों के बीच से चन्द्रमा गुजरता है, चन्द्रमा व सितारों के समूह के उसी संयोग को नक्षत्र कहा जाता है। चन्द्रमा की 360˚ की एक परिक्रमा के पथ पर लगभग 27 विभिन्न तारा-समूह बनते हैं, आकाश में तारों के यही विभाजित समूह नक्षत्र या तारामंडल के नाम से जाने जाते हैं। इन 27 नक्षत्रों में चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र की 13˚20’ की परिक्रमा अपनी कक्षा में चलता हुआ लगभग एक दिन में पूरी करता है।
प्रत्येक नक्षत्र एक विशेष तारामंडल या तारों के एक समूह का प्रतिनिधी होता है।
27 नक्षत्र इस तरह हैं –अस्वनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगसिरा, रुद्रा, पुनरवासु, पूष, अस्लेशा, माघ, पूर्व फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, साका, अनुराधा, जयेष्ट, मूल, पूर्ववैशादा, उत्त्रशादा, श्रवण, धनिष्ठा, स्थाबिशक, पूर्व बरोश्तापध, उत्तरा बरोश्तापध, रेवति तथा अभिजीत 28 नक्षत्र है जिसका उपयोग आधारभूत तौर पर मुहूर्त के लिए किया जाता है.
सभी नक्षत्रों की अपनी दैवीक विशेषता होती है तथा प्रत्येक नक्षत्र इनके देवी के अध्यात्मिक बल से चलते हैं.
कहा जाता है कि ग्रह से बडा नक्षत्र होता है और नक्षत्र से भी बडा नक्षत्र का पाया होता है। हर नक्षत्र अपने अपने स्वभाव के जातक को इस संसार मे भेजते है और नक्षत्र के पदानुसार ही जातक को कार्य और संसार संभालने की जिम्मेदारी दी जाती है।
27 नक्षत्रो के देवताओं का वर्णन किया जा रहा है |
1.अश्वनी का स्वामी = नासत्य (दोनों अश्वनी कुमार)
2.भरणी का स्वामी =अन्तक (यमराज)
3.कृतिका का स्वामी = अग्नि
4.रोहिणी का स्वामी = धाता (ब्रह्मा)
5.म्रगशिरा का स्वामी = शशम्रत (चन्द्रमा)
6.आर्दा का स्वामी = रूद्र (शिव)
7.पुनर्वसु का स्वामी = आदिती (देवमाता)
8.पुष्य का स्वामी =वृहस्पति
9.श्लेषा का स्वामी =सूर्य
10.मघा का स्वामी = पितर
11.पूर्व फाल्गुनी का स्वामी = भग्र
12.उत्तरा फाल्गुनी का स्वामी = अर्यमा
13.हस्त का स्वामी = रवि
14.चित्र का स्वामी = विश्वकर्मा
15.स्वाती का स्वामी = समीर
16.विशाखाका स्वामी = इन्द्र और अग्नि
17.अनुराधा का स्वामी = मित्र
18.ज्येष्ठा का स्वामी = इन्द्र
19.मूल का स्वामी = निर्रुती (राक्षस)
20.पुर्वाशाडा का स्वामी = क्षीर (जल)
21.उत्तरा शाडा का स्वामी = विश्वदेव / अभिजित = विधि विधाता
22.श्रवण का स्वामी = गोविन्द ( विष्णु )
23.धनिष्ठा का स्वामी = वसु (आठ प्रकार के वसु)
24.शतभिषा का स्वामी = तोयम
25.पूर्वभाद्र का स्वामी = अजचरण (अजपात नामक सूर्य)
26.उत्तरा भाद्रपद का स्वामी = अहिर्बुध्न्य (नाम का सूर्य)
27.रेवती का स्वामी = पूषा (पूषण नाम का सूर्य) |
नोट -- जो 27 नक्षत्रो के स्वामी कहे गए है उन्ही देवताओं की अर्जन करना भाग्य वर्धक रहता है | जो दोष है उनकी शांति नक्षत्र के स्वामी की करनी चाहिए | भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए नक्षत्रो की पूजा अवश्य करनी चाहिए | लोग कहते है की परिश्रम के अनुसार लाभ नहीं मिल रहा है, रात दिन मेहनत करते है,परिवार में शांति नहीं रहती है इन्ही का पूजन अवश्य करना चाहिए |
नक्षत्र का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता हैं?
चन्द्रमा का एक राशिचक्र 27 नक्षत्रों में विभाजित है, इसलिए अपनी कक्षा में चलते हुए चन्द्रमा को प्रत्येक नक्षत्र में से गुजरना होता है। आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होगा, वही आपका जन्म नक्षत्र होगा। आपके वास्तविक जन्म नक्षत्र का निर्धारण होने के बाद आपके बारे में बिल्कुल सही भविष्यवाणी की जा सकती है। अपने नक्षत्रों की सही गणना व विवेचना से आप अवसरों का लाभ उठा सकते हैं। इसी प्रकार आप अपने अनेक प्रकार के दोषों व नकारात्मक प्रभावों का विभिन्न उपायों से निवारण भी कर सकते हैं। नक्षत्रों का मिलान रंगों, चिन्हों, देवताओं व राशि-रत्नों के साथ भी किया जा सकता है।
नक्षत्र तारासंख्या आकृति और पहचान
अश्विनी 3 घोड़ा
भरणी 3 त्रिकोण
कृत्तिका 6 अग्निशिखा
रोहिणी 5 गाड़ी
मृगशिरा 3 हरिणमस्तक वा विडालपद
आर्द्रा 1 उज्वल
पुनर्वसु 5 या 6 धनुष या धर
पुष्य 1 वा 3 माणिक्य वर्ण
अश्लेषा 5 कुत्ते की पूँछ वा कुलावचक्र
मघा 5 हल
पूर्वाफाल्गुनी 2 खट्वाकार X उत्तर दक्षिण
उत्तराफाल्गुनी 2 शय्याकारX उत्तर दक्षिण
हस्त 5 हाथ का पंजा
चित्रा 1 मुक्तावत् उज्वल
स्वाती 1 कुंकुं वर्ण
विशाखा 5 व 6 तोरण या माला
अनुराधा 7 सूप या जलधारा
ज्येष्ठा 3 सर्प या कुंडल
मुल 9 या 11 शंख या सिंह की पूँछ
पुर्वाषाढा 4 सूप या हाथी का दाँत
उत्तरषाढा 4 सूप
श्रवण 3 बाण या त्रिशूल
धनिष्ठा 5 मर्दल बाजा
शतभिषा 100 मंडलाकार
पूर्वभाद्रपद 2 भारवत् या घंटाकार
उत्तरभाद्रपद 2 दो मस्तक
रेवती 32 मछली या मृदंग
इन 27 नक्षत्रों के अतिरिक्त 'अभिजित्' नाम का एक और नक्षत्र पहले माना जाता था पर वह पूर्वाषाढ़ा के भीतर ही आ जाता है, इससे अब 27 ही नक्षत्र गिने जाते हैं । इन्हीं नक्षत्रों के नाम पर महीनों के नाम रखे गए हैं । महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा जिस नक्षत्र पर रहेगा उस महीने का नाम उसी नक्षत्र के अनुसार होगा, जैसे कार्तिक की पूर्णिमा को चंद्रमा कृत्तिका वा रोहिणी नक्षत्र पर रहेगा, अग्रहायण की पूर्णिमा को मृगशिरा वा आर्दा पर; इसी प्रकार और समझिए।
28वें नक्षत्र का नाम अभिजित उत्तराषाढ़ा और श्रवण मध्ये ताराओं के समूह को नक्षत्र कहते हैं। आकाश स्थित अरबों मील के दायरे में फैले हुए तारामंडल को विवेचन की सुविधा के लिए सत्ताईस प्रमुख समूहों में विभक्त किया गया है।
प्रत्येक तारा समूह को नक्षत्र कहते हैं। प्रत्येक नक्षत्र की आकृति के अनुसार उसका नामकरण किया गया है। अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, घनिष्ठा, शतमिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद व रेवती। उत्तराषाढ़ के अंतिम चरण एवं श्रवण के आदि के पंचदशांश को अभिजित कहा गया है। इसे लेकर नक्षत्रों की संख्या 28 हो जाती है, किन्तु तारा विचार, राशि विचार आदि में अभिजित की गणना नहीं होती है। इसलिए नक्षत्रों की संख्या 27 ही प्रसिद्ध है।
ये नक्षत्र गुण एवं स्वभाव के अनुसार चराचर को प्रभावित करते हैं। समस्त आकाश मंडल यानी 360 अंश को 27 से भाग देने पर 13 अंश 20 कला क्षेत्र एक नक्षत्र का दायरा होता है। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में एक नामाक्षर की कल्पना की गई है। प्रत्येक नक्षत्र की दूरी को चार से भाग देने से 3 अंश 20 कला का एक चरण होता है।
भेद: स्वभाव के अनुसार नक्षत्र के सात भेद हैं। ये हैं- ध्रुव, चर, उग्र, मिश्र, लघु, मृदु और दारुण।
ध्रुव संज्ञक नक्षत्र- रविवार के दिन रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद होने से बीजवपन, शुभकार्य, वस्त्र, आभूषण धारण, नृत्य व मैत्री आदि कार्य उत्तम माना जाता है।
चर संज्ञक नक्षत्र- स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतमिषा सोमवार को होने से वाहन क्रय-विक्रय, यात्रा, कला, शिक्षा इत्यादि कार्य उत्तम माने जाते हैं।
उग्र संज्ञक नक्षत्र-भरणी, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद यदि मंगलवार को हो तो निन्दित कार्य उत्तम माना जाता है।
मिश्र संज्ञक नक्षत्र- कृतिका, विशाखा यदि बुधवार को हो तो व्यापार, शस्त्र, विष घात व मांगलिक कार्य उत्तम माने जाते हैं।
लघु संज्ञक नक्षत्र- अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित, आदि गुरुवार को हो तो रतिकार्य, शिल्प, चित्रकला, ज्ञानार्जन व वाहन कार्य आदि उत्तम माना जाता है।
मृदु संज्ञक नक्षत्र- मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती यदि शुक्रवार को हो तो गृह संबंधी कार्य, बीजवपन, आभूषण, क्रीड़ा, शपथ व उत्सवादि कार्य उत्तम माना जाता है।
दारुण संज्ञक नक्षत्र- आश्लेषा, श्लेषा, ज्येष्ठा, मूल यदि शनिवार को हो तो निन्दित कार्य उत्तम माना जाता है।
नक्षत्रों का वर्गीकरण मुख ज्ञान के आधार पर तीन श्रेणियों में किया गया है।
उर्ध्व मुख संज्ञक नक्षत्र- रोहिणी, आश्लेषा, पुष्य, उ.फा., उ.षा., श्रवण, धनिष्ठा, शतमिषा, उ.भाद्रपद उर्ध्वमुख नक्षत्र कहलाता है। इसमें देवालय निर्माण, गृह निर्माण, ध्वजारोहण, बागीचा और समस्त मांगलिक कार्य उत्तम माना जाता है।
अधोमुख नक्षत्र- भरणी, कृतिका, श्लेषा, मघा, पू. फाल्गुनी, विशाखा, मूल, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र अधोमुख हैं। इसमें कूप, तालाब, नलकूप, नींव खनन आदि कार्य उत्तम माना जाता है।
पार्श्वमुख नक्षत्र- अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा और रेवती पार्श्वमुख नक्षत्र हैं, इसमें चतुष्पद क्रय, वाहन कार्य, हल प्रवहणादि कार्य उत्तम माने जाते हैं।
बच्चों के जन्म के समय पाद विचार
रजतपाद नक्षत्र- आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्लेषा, मघा, पू. फाल्गुनी, उ. फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, ये रजतपाद नक्षत्र कहलाते हैं। इनका फल सौग्यदाभायक है।
लौहपाद नक्षत्र- विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, लौहपाद नक्षत्र हैं, इनका फल धनहानि है।
ताम्रपाद नक्षत्र- उ.षा., पू.षा., श्रवण, धनिष्ठा, शतमिषा, पू.भा., उ.भा. ताम्रपाद कहलाते हैं। इनका फल शुभ है।
सुवर्णपाद नक्षत्र- रेवती, अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, सुवर्णपाद नक्षत्र हैं, इनका फल सर्व सौख्यप्रद है।
नक्षत्रों के चरण तथा इनके चरणाक्षर
ज्योतिषशास्त्र ने आसानी से समझने के लिए हर नक्षत्र के चार-चार भाग किए हैं, जिन्हें प्रथम चरण, दूसरा चरण, तृतीय चरण व चतुर्थ चरण का नाम दिया गया है।
नक्षत्रों के चरणाक्षर
हरेक नक्षत्र के जो 4-4 चरण होते हैं, उनमें से प्रत्येक नक्षत्र के प्रत्येक चरण को एक-एक नक्षत्र ज्योतिष शास्त्र ने निर्धारित कर दिया है जिस नक्षत्र के जिस चरण में जिस व्यकित का जन्म होता है, उसका नाम उसी जन्मकालीन नक्षत्र के चरणाक्षर पर रखा जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी भी व्यक्ति का जन्म अश्विनी नक्षत्र के दूसरे चरण में होता है तो उसका नाम इसी नक्षत्र के दूसरे चरण के अक्षर चे से रखा जाएगा। जैसे चेतन्य, चेतक, चेरम आदि। किस नक्षत्र के कौन कौन से अक्षर होते हैं इसे इस टेबल के अनुसार अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
नक्षत्र के अनुसार नामकरण
जिस नक्षत्र के चरण में बच्चे का जन्म हुआ होता है उसी चरण के अक्षर पर नामकरण करने का विधान है। उसी अक्षर पर नामकरण किया जाता है। जिस तिथी पर बच्चे का जन्म होता है उस दिन का पंचांग हम देखेंगे। उस दिन जिस नक्षत्र या राशि पर चंद्रमा होगा उसी के अनुसार बच्चे का नाम रखा जाएगा। पंचाग में नक्षत्र कब शुरु हुआ उसका समय लिखा होता है और उस समय को हम चार भागों में बांट सकते हैं। मान लो बच्चे का जन्म दिन के 12 बजे हुआ है और उस दिन भरणी नक्षत्र था। जो सुबह 10 बजे से शुरु था। हर नक्षत्र चरण लगभग 6 घंटे का होता है। यानि 3 बजे तक भरणी का प्रथम चरण था। बच्चे का जन्म 3 बजे के बाद हुआ तो दूसरा चरण और रात्रि 8 बजे के बाद तीसरा तथा रात्रि 1 बजे के बाद चौथा चरण शुरु होगा। आप अधिक जानकारी के लिए पंचांग देखें यदि आपको फिर भी नामकरण के बारे में कोई संशय हो तो आप ज्योतिषी से सलाह ले सकते हैं। राशि के अनुसार नामाक्षर भी तालिका में दिए गए हैं।
नक्षत्र लिस्ट-:
21:19 000
=
Call/Whatsapp +9198726-65620
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Nakshtra Chart, nakshatron ke charan
भारतीय ज्योतिष में नक्षत्रों का ग्रहों के समान ही विशेष महत्व है। आकाश मंडल में 27 नक्षत्र हैं जिनके विभिन्न आकार हैं ये आकार पशु पक्षियों की तरह भी प्रतीत होते हैं। ये 27 नक्षत्र हैं। ये सभी नक्षत्र इनमें जन्म लेने वाले जातकों के जीवन में बहुत ही बड़ा प्रभाव डालते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि पुराणों में इन नक्षत्रों को दक्ष प्रजापति की पुत्रियां माना जाता है। जिस नक्षत्र में जातक जन्म लेता है उस नक्षत्र का उसके जीवन में प्रभाव रहता है। किसी भी नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक उस नक्षत्र के गुण-दोष के अनुसार ही होता है। हर मनुष्य का स्वभाव, गुण-धर्म, जीवन शैली जन्म नक्षत्र से जुड़ी है ऐसा भारतीय ज्योतिषियों का मानना। जिस नक्षत्र में जातक जन्म लेता है वही नक्षत्र उसके स्वभाव और जीवन पर भी अपना असर छोड़ता है।
नक्षत्र किसे कहा जाता है ? What is Nakshatra?
भारतीय ज्योतिष में नक्षत्र के सिद्धांत स्पष्ट तौर पर बताए गए हैं। नक्षत्र के सिद्धांत प्रमाणित व अचूक हैं। आपको पता होगा कि चन्द्रमा 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है। इस एक मासिक चक्र के दौरान चन्द्रमा जिन मुख्य सितारों के समूहों के बीच से गुजरता है. इन्ही तारों के समूह को नक्षत्र कहा जाता है। जब चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा कर रहा होता है तो इस दौरान वह जिन तारा समूहों के पास से होकर गुजरता है, में 27 विभिन्न तारा-समूह बनते हैं। इन्ही तारों के विभाजित समूह को नक्षत्र या तारामंडल कहा जाता है। प्रत्येक नक्षत्र एक विशेष तारामंडल या तारों के एक समूह का प्रतिनिधि होता है। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि नक्षत्रों तारों का समूह है। हर नक्षत्र विशेष प्रकार की आकृति बनाता है या आकृति में है।
जिस प्रकार प्राचीन काल में ज्योतिषियों व गणनाकारों ने राशियों को सरलता से समझने के लिए इनको 12 भागों में बाँट दिया था. इसी प्रकार आकाश को 27 नक्षत्रों में। इन नक्षत्रों की गणना ज्योतिष में महत्वपूर्ण है। एक नक्षत्र को एक सितारे के समान समझा जा सकता है। सभी नक्षत्रों को 4 पदों में या 3 डिग्री और 20 मिनट के अन्तराल में बांटा गया है। आकाश मंडल के 9 ग्रहों को 27 नक्षत्रों का अर्थात हर ग्रह को तीन नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त है। इस प्रकार प्रत्येक राशि में 9 पद शामिल हैं। चंद्रमा का नक्षत्रों से मिलन 'नक्षत्र योग' और ज्योतिष को नक्षत्र विद्या' भी कहा जाता है।
सबसे खराब नक्षत्र कौन सा है?
सबसे खराब व परेशानी देने वाला नक्षत्र मूल को माना जाता है। अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल एवं रेवती नक्षत्र को (गंडमूल) नक्षत्र कहा जाता है। इन नक्षत्रों के समय जन्म लेने वाले जातक स्वयं तथा अपने माता-पिता, मामा आदि के लिए कष्टदायक बताएं गए हैं।
नक्षत्र का एक चरण कितने घंटे का होता है?
जैसा कि हम जानते हैं कि हर नक्षत्र को 4 भागों में बांटा गया है। ऐसा कह सकते हैं कि एक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। नक्षत्र के चरण को पाद भी कहा जाता है। हर चरण का मान 130-20'+43 अंश 20 कला होता है। इस प्रकार हम जान सकते हैं कि 27 गुणा 4 बराबर है 108 यानि 27 नक्षत्रों में कुल 108 चरण होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक राशि में 108 129 चरण होंगे। हम जानते हैं कि चंद्र लगभग 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट में पृथ्वी की नाक्षत्रिक परिक्रमा करता है या पृथ्वी का चक्कर लगाता है। नक्षत्रों की कुल संख्या भी 27 ही है। इस प्रकार चंद्र लगभग एक दिन (60 घटी या 24 घंटे) या लगभग 24 घंटे में एक नक्षत्र का भोग करता है। एक दिन में 24 घंटे होते हैं और एक नक्षत्र में 4 चरण होते हैं। इस प्रकार 24 घंटों को 4 तो एक नक्षत्र का चरण लगभग 6 घंटे का होता है। चंद्रमा कम गति के कारण एक नक्षत्र को अपनी कम गति से पार करने में लगभग 67 घटी का समय लेता है तथा अपनी अधिकतम गति से पार करने में लगभग 52 घटी का समय ले सकता है। एक घटी 24 मिनट के समान होती है।
27 नक्षत्र इस प्रकार है
सभी नक्षत्रों का 0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री नामकरण किया गया है
1. अश्विनी
2. भरणी
3. कृतिका
4. रोहिणी
5 मृगशिरा
6. आद्रा
7. पुनर्वसु
8. पुष्य
9. अश्लेशा
10. मघा
11. पूर्वाफाल्गुनी
12. उत्तराफाल्गुनी
13. हस्त
14. चित्रा
15. स्वाति
16. विशाखा
17. अनुराधा
18. ज्येष्ठा
19 मूल
20. पूर्वाषाढा
21. उत्तराषाढा
22. श्रवण
23. धनिष्ठा
24. शतभिषा
25. पूर्वाभाद्रपद
26. उत्तराभाद्रपद और
27. रेवती।
27 नक्षत्रों की विशेषताएं और उनका जातकों के गुण एवं स्वभाव पर प्रभाव
1 अश्वनी नक्षत्र
अश्विनी नक्षत्र संपूर्ण फलादेश राशि चक्र में 00 अंश 13 अंश 20 कला के विस्तार वाला क्षेत्र अश्विनी नक्षत्र कहलाता है। अश्विनी नाम दो अश्विन से बना है। ग्रीक में इसको कस्टर और पोलुक्स, अरब मंजिल में अल शरतैन, चीन के सियु में ल्यु कहते हैं। कालब्रुक और बाद की धरणाओं के अनुसार अश्विनी नक्षत्र दो अश्व मुख के प्रतीक तीन तारों का समूह है। देवता-अश्विनी कुमार स्वामी-केतु राशि-मेष 00 अंश से 13 अंश 20 कला भारतीय खगोल में अश्विनी प्रथम नक्षत्र है। मुहूर्त ज्योतिष में इसे लघु क्षिप्र नक्षत्र कहते हैं। अश्निवी की जाति वैश्य, योनि अश्व, योनि वैर महिष गण देव, नाड़ी आदि है। जातक जीवन में शीघ्र उन्नति करता है। जातक हठी, शांत, निश्चल, कार्य को अगोचर रूप से करने वाला होता है। ये लक्षण 14 से 20 अप्रेल अश्विनी में उच्च का सूर्य और 14 से 28 अक्टूम्बर स्वाति में नीच का सूर्य मे विशेष परिलक्षित होते
प्रत्येक चरण में तीन ग्रह का प्रभाव होता है-
1- राशि स्वामी,
2- नक्षत्र स्वामी,
3- चरण स्वामी।
अश्विनी नक्षत्र का प्रथम चरण
इसमे मंगल, केतु और मंगल का प्रभाव है। सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन और कार्य मे उसका मन नही होता है। अश्विनी सूर्य चरण फल प्रथम चरण जातक वाकपटु, आत्मविश्वासी, उत्साही, शासकीय संस्था में उच्च पदासीन, समाज में शक्तिशाली, तीर्थयात्री, स्पष्टवादी होता है। अश्विनी नक्षत्र का द्वितीय चरण जातक छोटी उम्र मे धनवान हो जाता है किन्तु क़ानूनी उलझन में धन खोना पड़ता है। विदेश में रहने पर निर्धन और अस्वस्थ, शासकीय सहायता प्राप्त होता है। परिवार में विरोधाभास होता है।
अश्विनी नक्षत्र का तृतीय चरण जातक धनवान किन्तु समाज मे प्रतिष्ठाहीन, कृषि से सम्पत्तिवान, सम्पदा-जमीन-जायदाद का दलाल, कर्मठ, स्व परिश्रम से व्यवसाय में उन्नत, साधारण स्वस्थ होता है। इसका पिता क़ानूनी मामले में धन खोने वाला होता है। अश्विनी नक्षत्र चतुर्थ चरण- जातक आध्यात्मिक और दैविक ज्ञानी, कृषि से सम्पत्तिवान, परिवार प्रिय, सेनाध्यक्ष या नेता अत्यधिक धनी नही पर समाज में प्रतिष्ठित, यात्रा प्रेमी, दानी, भूखो को निशुल्क आहार कराने वाला होता है। अश्विनी नक्षत्र के अक्षर- चु, चे, चो, ला
1. अश्विनी नक्षत्र का व्यक्तित्व पर प्रभावः
नक्षत्रों की कुल संख्या 27 है। विशेष परिस्थिति में अभिजीत को लेकर इनकी संख्या 28 हो जाती है। गोचरवश नक्षत्र दिवस बदलता रहता है। हर नक्षत्र का अपना प्रभाव होता है। जिस नक्षत्र में जातक का जन्म होता है। उसके अनुसार ही उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और आचरण हो सकता है। इन नक्षत्रों में सबसे पहला नक्षत्र अश्विनी है। अश्विनी नक्षत्र को गण्डमूल नक्षत्र है। इस नक्षत्र का स्वामी केतुदेव हैं। इस नक्षत्र में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति बहुत ही उर्जावान होते हैं। सदैव सक्रिय रहना पसंद करते हैं। इन्हें खाली बैठना अच्छा नहीं लगता, ये हमेशा कुछ न कुछ करते रहना पसंद करते हैं। इन्हें बड़े और महत्वपूर्ण काम करने में मज़ा आता है। अश्विनी नक्षत्र में जिनका जन्म होता है वे रहस्यमयी होते हैं। इन्हें समझ पाना काफी मुश्किल होता है। ये जो भी हासिल करने की सोचते हैं उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने से नहीं डरते। ये इस प्रकार के कार्य कर जाते हैं जिसके बारे में कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा पाता। इनमें उतावलापन बहुत होता है। बहुत जल्दी गुस्सा करते हैं। ये काम को करने से पहले नहीं सोचते अपितु बाद में उस पर विचार करते हैं। ये अपने शत्रुओं से बदला लेने में ये पीछे नहीं हटते। अपने दुश्मनों को पराजित करना इन्हें आता है। जातक को दबाव या ताकत से वश में नहीं किया जा सकता। ये प्रेम एवं अपनत्व से ही वश में आते हैं। इनका जीवन संघर्ष में गुजरता है। इनके अच्छे मित्र होते हैं। जातक अक्सर छल कपट से दूर ही रहते हैं। ये मित्रता निभाते हैं। बाहर से सख्त दिखते हैं परंतु भीतर से कोमल हृदय के होते हैं।
अपनी धुन के पक्के होते हैं, जो भी तय कर लेते हैं उसे पूरा करके दम लेते हैं। ज्योतिष शास्त्र में सबसे प्रमुख और सबसे प्रथम अश्विन नक्षत्र को माना गया है। अश्वनी नक्षत्र में जन्मे जातक सामान्यतः सुन्दर चतुर, सौभाग्यशाली एवं स्वतंत्र विचारों वाले और आधुनिक सोच के लिए मित्रों में प्रसिद्ध होते हैं। इस नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति बहुत ऊर्जावान होने के सथ-साथ हमेशा सक्रिय रहता है। इनकी महत्वाकांक्षाएं इन्हें संतुष्ट नहीं होने देतीं। ये लोग सभी से बहुत प्रेम करने वाले, हस्तक्षेप न पसंद करने वाले, रहस्यमयी प्रकृत्ति के होते हैं। ये लोग अच्छे जीवनसाथी और एक आदर्श मित्र साबित होते हैं।
2. भरणी नक्षत्र के जातक का व्यक्तित्व
भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र ग्रह होता है, जिसकी वजह से इस नक्षत्र में जन्में लोग एक दृढ़ निश्चयी, चतुर, सदा सत्य बोलने वाले, आराम पसंद और आलीशान जीवन जीने वाले होते हैं। ये लोग काफी आकर्षक और सुंदर होते हैं, इनका स्वभाव लोगों को आकर्षित करता है। इनके अनेक मित्र होंगे और मित्रों में बहुत अधिक लोकप्रिय भी होंते है। इनके जीवन में प्रेम सर्वोपरि होता है और जो भी ये ठान लेते हैं उसे पूरा करने के बाद ही चैन से बैठते हैं। इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान हमेशा बना रहता है। नक्षत्रों की कड़ी में भरणी को द्वितीय नक्षत्र माना जाता है। जो व्यक्ति भरणी नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे सुख सुविधाओं एवं ऐसो आराम चाहने वाले होते हैं। इनका जीवन भोग विलास एवं आनन्द में बीतता है। ये देखने में आकर्षक व सुन्दर होते हैं। इनका स्वभाव भी सुन्दर होता है जिससे ये सभी का मन मोह लेते हैं। इनके जीवन में प्रेम का स्थान सर्वोपरि होता है। इनके दिल में प्रेम तरंगित होता रहता है तथा विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के प्रति आकर्षण एवं लगाव रखते हैं। भरणी नक्षत्र के जातक उर्जा से परिपूर्ण रहते हैं। ये संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ये दृढ़ निश्चयी एवं साहसी होते हैं। इस नक्षत्र के जातक जो भी दिल में ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। आमतौर पर ये विवाद से दूर रहते हैं फिर अगर विवाद की स्थिति बन ही जाती है तो उसे प्रेम और शान्ति से सुलझाने का प्रयास करते हैं। अगर विरोधी या विपक्षी बातों से नहीं मानता है तो उसे अपनी चतुराई और बुद्धि से पराजित कर देते हैं। भरणी के जातक अपनी विलासिता को पूरा करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। इनका हृदय कवि के समान होता है। ये किसी विषय में दिमाग से ज्यादा दिल से सोचते हैं। ये नैतिक मूल्यों का आदर करने वाले और सत्य का पालन करने वाले होते हैं। ये रूढ़िवादी नहीं होते हैं और न ही पुराने संस्कारों में बंधकर रहना पसंद करते हैं। ये स्वतंत्र प्रकृति के एवं सुधारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले होते हैं। इन्हें झूठा दिखावा व पाखंड पसंद नहीं होता। पत्नी गुणवंती और देखने व व्यवहार मे सुन्दर होती हैं।
भरणी नक्षत्र के अक्षर ली, लू, ले, लो
3. कृत्तिका नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक
नक्षत्रों की गणना में तीसरे स्थान पर रहने वाले नक्षत्र कृतिका का सूर्यदेव स्वामी माना जाता है। जातक पर सूर्य का प्रभाव रहता है। सूर्य के प्रभाव के कारण ये आत्मसम्मान से परिपूर्ण होते हैं। ये स्वाभिमानी होंते हैं और तुनक मिज़ाज भी, छोटी-छोटी बातों पर ये उत्तेजित हो उठते हैं और गुस्से से लाल पीले होने लगते हैं। ये उर्जा से परिपूर्ण होते हैं और दृढ़ निश्चयी होते हैं। लगनशील होते हैं, जिस काम को भी अपने जिम्मे लेते हैं उसमें परिश्रम पूर्वक जुटे रहते हैं। ये नियम के भी पक्के होते हैं। नौकरी में अधिक कामयाब होते हैं। मित्रता का दायरा बहुत छोटा होता है क्योंकि ये लोगों से अधिक घुलते मिलते नहीं हैं परंतु जिनसे मित्रता करते हैं। प्रेम सम्बन्धों के मामले से दूर रहना पसंद करते हैं। इनकी संतान कम होती है, परंतु पहली संतान गुणवान व यशस्वी होती है। पत्नी से इनके सम्बन्ध सामान्य रहते हैं। ये लोग जिस भी काम को अपने हाथ में लेते हैं उसे पूरी लगन और मेहनत के साथ पूरा करते हैं।
कृतिका नक्षत्र के चरण कृतिका नक्षत्र के अक्षर-
अ,इ,उ,ए
4. रोहिणी नक्षत्र के जातक
रोहिणी नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है। जातक काफी कल्पनाशील और रोमांटिक स्वभाव के होते हैं। ये लोग काफी चंचल स्वभाव के होते हैं और एक जगह पर ये टिक नहीं सकते। कभी एक ही मुद्दे पर टिके नहीं रहते। जातक दूसरों में गलतियां ढूँढता रहता है। दूसरों की गलतियों के बारे में चर्चा करना और उनका मजाक उड़ाना ही इन्हें पसंद होता है। दूसरों को चिढ़ाने में ये लोग बहुत ही मजा लेते हैं। कई बार ये लोग हद से बाहर भी हो जाते हैं। स मिलनसार, सभी सुख-सुविधाओं को पाने की कोशिश भी करते रहते हैं। रोहिणी चारों चरणों में वृषभराशि में होता है। ये कल्पना की ऊंची उड़ान भरने वाले होते हैं। मन हिरण के समान चंचल होता है। संगीत, नृत्य, चित्रकारी, शिल्पकला आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
जीवन सुखमय रहता है. ये सभी प्रकार के सांसारिक सुखों का आनन्द लेते हैं। जीवन में निरंतर आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। उच्च पद तक जाते हैं। जीवन रोमांस से भरपूर होता है। यात्रा करना, सैर सपाटा करना काफी अच्छा लगता है। इनके बच्चे समझदार और नेक गुणों वाले होते हैं।
रोहिणी नक्षत्र के नाम अक्षर ओ, वा, वी, वू
5. मृगशिरा नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक काव्यक्तित्व- मृगशिरा पांचवां नक्षत्र है, मंगलदेव का प्रभाव रहता है। मृगशिरा नक्षत्र का स्वामी मंगलदेव है। जातक दृढ़ निश्चयी होते हैं ये स्थायी काम करना पसंद करते हैं, ये जो काम करते हैं उसमें हिम्मत और लगन पूर्वक जुटे रहते हैं। ये आकर्षक व्यक्तित्व और रूप के स्वामी होते हैं। इनका हृदय निर्मल और पवित्र होता है। मानसिक तौर पर बुद्धिमान होते और शारीरिक तौर पर तंदरूस्त होते हैं। इनके स्वभाव में उतावलापन रहता है जिसकारण आशा के अनुरूप इन्हें परिणाम नहीं मिल पाता है। संगीत के शौकीन होते हैं। व्यक्तिगत जीवन में ये अच्छे मित्र साबित होते हैं। वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखमय होता है क्योंकि ये प्रेम में विश्वास रखने वाले होते हैं। जातक बहादुर होते हैं ये जीवन में आने वाले उतार चढाव को लेकर सदैव तैयार रहते हैं। मंगल का प्रभाव होने की वजह से ये लोग स्वभाव से काफी साहसी, दृढ निश्चय चतुर, अध्ययन में अधिक रूचि, माता पिता के आज्ञाकारी और सदैव साफ सुथरे आकर्षक वस्त्र पहनने बाले होते हैं। ये लोग स्थायी जीवन जीने में विश्वास रखते हैं और हर काम पूरी मेहनत के साथ पूरा करते हैं।
मृगशिरा नक्षत्र के नाम अक्षर वे, वो, का, की
6. आर्द्रा नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक का व्यक्तित्व
आर्द्रा नक्षत्र की राशि मिथुन है। जीवनभर राहु और बुध का प्रभाव रहता है। जातक राजनीति में अब्बल होते हैं और चतुराई से अपना मकसद पूरा करना जानते हैं। मधुर वाणी और वाकपटुता से ये लोगों को अपनी और आकर्षित कर लेते हैं। इस नक्षत्र के जातक का मस्तिष्क हमेशा क्रियाशील और सक्रिय रहता है। ये लोग सफलता हेतु साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति भी खुल कर अपनाते हैं। आम तौर पर प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में सक्रिय रहते हैं और अगर प्रत्यक्ष रूप से न भी रहें तो अप्रायक्ष रूप से राजनीतिक हलकों में इनकी अच्छी पकड रहती है, ये राजनेताओं से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखते हैं। समाज में इनकी छवि बहुत अच्छी नहीं रहती और लोग इनके लिए नकारात्मक विचार रखने लगते हैं। अपने आस-पास की घटनाओं के बारे में जागरूक और व्यापार करने की समझ इनकी महान विशेषता है। ये लोग इतने शातिर होते हैं कि सामने वाले के दिमाग में क्या चल रहा है उसे तुरंत जान लेते हैं। इन्हें आसानी से छला नहीं जा सकता। जातक निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए नैतिकता को भी छोड़ देते हैं।
आर्द्रा नक्षत्र का प्रथम चरण आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा हुआ जातक बहुत ही जिज्ञासु होता है। वह जीवन में गुप्त विद्याओं को जानने में लगा रहता है। इसका पहला पद गुरु यानि बृहस्पति की तरफ से शासित होता है और यह धनु के नवांश में पड़ता है। जातक बहुत ज्यादा भौतिकवादी हो सकता है जिस कारण वह व्यसनों का भी शिकार हो सकता है। इस चरण में ग्रह कमजोर या शिचिल रहते हैं जो जातक के व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं। आर्द्रा नक्षत्र का दूसरा चरण इस चरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जीवन में उथल-पुथल रहती है। जातक को पता नहीं चलता कि कौन सा निर्णय सही है और कौन सा गलत। जातक अपनी महत्वकांक्षाओं व कुंठाओं से ग्रसित रह सकता है। जीवन में संघर्ष व तूफानों का सामना करता है। इस नक्षत्र की दूसरी तिमाही होती है और यह मकर नवांश में शनिदेव द्वारा शासित होती है। इस चरण में पैदा होने वाले जातकों में अक्सर नकारात्मक ऊर्जा दिखाई देती है।
आर्द्रा नक्षत्र का तीसरा चरण इस चरण में पैदा हुआ जातक तेज दीमाग वाला, साहसी व आगे बढ़ने वाला होता है। ऐसे लोग वैज्ञानिक दीमाग रखने वाले होते हैं और नई चीजों का अविष्कार करते रहते हैं। यह पद शनिदेव द्वारा शासित होता है और कुम्भ नवांश में पड़ता है। जातक अचानक कहीं से प्रेरणा पाता है और तेजी से आगे निकल जाता है। यह रेस में पीछे रहकर भी अंत में तेजी से आगे निकल कर रेज जीत जाता है।
आद्रा नक्षत्र का चौधा चरण- इस चरण में पैदा हुआ जातक करुणा व दया से भरा होता है। उससे किसा का भी दुख देखा नहीं जाता। एक शांत समुद्र की तरह होता है जिसमें ज्वारभाटे आते रहते हैं। सकारात्मक ऊर्जा से भरा इंसान लोगों की मदद करने को तैयार रहता है। यह पद गुरु द्वारा शासित होता है और मीन नवांश में पड़ता है। इसका उच्च व्यक्तित्व होता है और दूसरों के लिए प्रेरणा व आदर्श होता है।
आर्द्रा नक्षत्र के नाम अक्षर कु.घ.ड.छ
7. पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक का व्यक्तित्व-
जातक में कुछ दैवीय शक्ति होती है। स्मरण क्षमता काफी अच्छी होती है. ये एक बार जिस चीज़ को देख या पढ़ लेते हैं उसे लम्बे समय तक अपनी यादों में बसाये रखते हैं। पुनर्वसु के जातक की अन्तदृष्टि काफी गहरी होती है। काफी मिलनसार होते हैं, ये सभी के साथ प्रेम और स्नेह के साथ मिलते है. इनका व्यवहार सभी के साथ दोस्ताना होता है।
आर्थिक मामलों के अच्छे जानकार होते हैं। सरकारी क्षेत्र में भी उच्च पद प्राप्त होता है। बच्चे शिक्षित, समझदार होते हैं. ये जीवन में कामयाब होकरउच्च स्तर का जीवन प्राप्त करते हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र के नाम अक्षर के, को, हा, ही
8. पुष्य नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक का व्यक्तित्व-
शनिदेव के प्रभाव वाले पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभ माना गया है। पुष्य नक्षत्र का स्वामी शनि है। पुष्य नक्षत्र को शुभ माना गया है। वार एवं पुष्य नक्षत्र के संयोग से रवि-पुष्य जैसे शुभ योग का बनना होता है। जातक को बाल्यावस्था में काफी मुश्किलों एवं कठिनाईयों से गुजरना पड़ता है। कम उम्र में ही विभिन्न परेशानियों एवं कठिनाईयों में से गुजरना पड़ता है। इस कारण युवावस्था में ही परिपक्व हो जाते हैं। जातक मेहनत और परिश्रम से कभी पीछे नहीं हटते। अपने काम में जुटे रहते हैं। ये अध्यात्म में काफी गहरी रूचि रखते हैं और ईश्वर भक्त होते हैं। विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के प्रति काफी लगाव व प्रेम रखते हैं। लम्बी यात्राओं व भ्रमण के शौकीन होते हैं। जीवन में धीरे-धीरे तरक्की करते जाते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा लेने वाले व्यक्ति अपनी मेहनत और लगन से जीवन में आगे बढ़ते हैं।
पुष्य नक्षत्र के नाम अक्षर- हु, हे, हो, डा
9 अश्लेषा नक्षत्र
आश्लेषा नक्षत्र यह नक्षत्र नेगेटिव एनर्जी वाला माना जाता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के भीतर भी विष की थोड़ी बहुत मात्रा अवश्य पाई जाती है। लग्न स्वामी चन्द्रमा के होने के कारण ऐसे जातक उच्च श्रेणी के चितित्सक, वैज्ञानिक या अनुसंधानकर्ता भी होते हैं।
अश्लेषा नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों का प्राकृतिक गुण सांसारिक उन्नति में प्रयानशीलता, लज्जा व सौदर्योपासना है। इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति की आँखों एवं वचनों में विशेष आकर्षण होता है। ये लोग कुशल व्यवसायी साबित होते हैं और दूसरों का मन पढ़कर उनसे अपना काम निकलवा सकते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों को अपने भाइयों का पूरा सहयोग मिलता है। आश्लेषा नक्षत्र का प्रथम चरण लग्न या चंद्रमा, आम्लेषा नक्षत्र के प्रथम चरण में आता हो तो ऐसा जातक बड़े शरीर वाला, स्वच्छ आंखों से मुक्त होता है। नज़रों में जादू व आकर्षण होता है। यह गौर वर्ण का होता है। सुंदर नाक एवं बड़े दांत होते हैं। बोलने में कुशल होता है। थनी एवं वाहनों से लाभ पाने वाला हो सकता है।
आश्लेषा नक्षत्र का दूसरा चरण लग्न या चंद्रमा आम्लेषा नक्षत्र के दूसरे चरण में आता हो तो गोल मटोल होत है. बाल बिखरे से और कम रोम वाला होता है, दूसरों के घर रहने वाला हो सकता है. कौए के समक्ष आकृति हो सकती है. जातक पर रोग का प्रभाव भी जल्द हो सकता। है।
आम्लेषा नक्षत्र का तीसरा चरण लग्न या चंद्रमा आम्लेषा नक्षत्र के तीसरे चरण में जातक का सिर उभार वाला हो सकता है. योग्य रुप से काम न कर पाए. आकर्षक मुख एवं भुजाओं वाला होता है. धीमा चलने बाला होता है. त्वचा से संबंधी विकार परेशान कर सकते हैं नाक थोड़ी चपटी हो सकती है.
आश्लेषा नक्षत्र का चौथा चरण (ashlesha nakshatra charan 4) आश्लेषा नक्षत्र 4 चरण लग्न या चंद्रमा, आश्लेषा नक्षत्र के चौथे चरण में आता हो तो जातक गौरे रंग का एवं मछली के समान आंखों वाला होता है. शरीर में चर्बी अधिक हो सकती है। कोमल पैर ओर भारी जांचे हो सकती हैं, टखने और घुटने पतले होते
गंड मूल नक्षत्र आम्लेषा आश्लेषा नक्षत्र के बारे में कहा जाता है कि अगर जातक का पहले पद में जन्म हुआ है तो माता को त्याग देता है, दूसरे पाये में पिता को त्याग देता है, तीसरे पाये में अपने बड़े भाई या बहन को और चौथे पाये में अपने को ही सात दिन, सात महीने, सात वर्ष के अन्दर सभी प्रभावों को दिखा देता है।
आश्लेषा नक्षत्र नाम अक्षर डी. डू, डे, डो
10 मधा नक्षत्रः मधा नक्षत्र के चार चरण
मघा नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र है। सूर्य इसका स्वामी है जिसकारण जातक बहुत प्रभावी बन जाते हैं। इनके भीतर ईश्वरीय आस्था यह होती है। इनके भीतर स्वाभिमान की भावना प्रबल होती है और बहुत ही जल्दी इनका दबदबा भी कायम हो जाता है। ये कर्मठ होते हैं और किसी भी काम को जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश करते हैं। आँखें विशेष चमक लिए हुए, चेहरा शेर के समान भरा हुआ एवं रौबीला होता है।
मधा नक्षत्र का प्रथम चरण लग्न या चंद्रमा, मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में आता हो तो ऐसा जातक अधिक क्रोधी स्वभाव का होता है। पतला पेट और नाक का अग्र भाग लालिमा युक्त होता है। बड़ा सिर व ऊंची मांसल छाती वाला। जातक बहादुर होता है।
मघा नक्षत्र का दूसरा चरण
लग्न या चंद्रमा, मघा नक्षत्र के दूसरे चरण में आता हो तो जातक का विशाल व ऊंचा मस्तक होता है. तिरछे नैन नक्श, लम्बी भुजाएं होती हैं। उभरी हुई छाती और मोटी फैली हुई सी नाक होती है।
मघा नक्षत्र का तीसरा चरण Nakshatron ke charan
लग्न या चंद्रमा, मघा नक्षत्र के तीसरे चरण में आता हो तो जातक भारी चौड़ी छाती वाला होता है, छाती पर अधिक बाल होते हैं. लाल आंखें, त्याग करने वाला होता है।
मघा नक्षत्र का चौतुर्थ चरण
लग्न या चंद्रमा, मघा नक्षत्र के चौथे चरण में आता हो तो जातक कोमल शरीर और त्वचा में चमक लिए होता है। आंखें बडी व पुतली काली होती है। कोमल केश वाला भारी हाथ पैर से युक्त तथा आवाज़ में थोड़ा रुखापन हो सकता है। इसका पेट कुछ मौटा होता है।
मघा नक्षत्र नाम अक्षर- मा.मी, मु, मे
11 पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक
पर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में हसा है तो आप ऐसे भाग्यशाली
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